ग्रामोफ़ोन की सबसे पहली रिकॉर्डिंग थी वेद के मन्त्र – जानिए कैसे ?

ग्रामोफ़ोन

क्या आप जानते हैं कि ग्रामोफ़ोन का अविष्कार होने पर उसमे सबसे पहले जो रिकॉर्डिंग की गयी थी , वह थी वेद के मन्त्र , तो आइये जानते है कि आखिर यह सब कैसे हुआ ?

ग्रामोफ़ोन की वास्तविक घटना क्या थी ?

जब इंग्लैंड में सर्वप्रथम ग्रामोफोन का आविष्कार हुआ और इस आविष्कार की प्रणेता कम्पनी ने यह उचित समझा की इसमें सर्वप्रथम किसी विशिष्ट व्यक्ति की वाणी को भरा जाए |

तब उनका ध्यान Oxford University के प्राच्य विद्या विभाग में कार्यरत Pro. Friedrich Max Müller की ओर गया | कम्पनी ने उनसे सम्पर्क किया तथा ग्रामोफोन में अपनी वाणी सुरक्षित करने का निवेदन किया |

उत्तर में मेक्समूलर का कहना था की यद्यपि वे जर्मन , फ्रेंच और अंग्रेजी आदि आधुनिक यूरोपीय भाषाओ को जानते हैं तथा उनको पुरातन ग्रीक और लेटिन आदि भाषाओ की भी जानकारी है तथापि वे स्वयं का गौरव इस बात में समझते हैं की वे भारत की ही नहीं , संसार की सर्वाधिक प्राचीन भाषा संस्कृत का भी उपयुक्त ज्ञान रखते हैं और वे चाहेंगे की ग्रामोफोन के प्रथम रिकॉर्ड में ऋग्वेद के प्रथम मंडल के प्रथम सूक्त के ९ मंत्रों को संगृहीत किया जाए |

तदनुसार उन्होने स्वयं अपनी अटपटे संस्कृत उच्चारण में संसार के प्रथम ग्रन्थ ऋग्वेद के प्रथम मंत्र

अग्निमीळे पुरोहितम् यज्ञस्य देवमृत्विजम् होतारं रत्नधाततम

से आरम्भ कर नवें मन्त्र

स नः पितेव सूनवेअग्ने सूपायनोभव | सचस्वा नः स्वस्तये ||

का पाठ किया और ये ही नौ मन्त्र ग्रामोफोन के प्रथम रेकॉर्ड में आये |

अपने वेद सम्बन्धी समस्त पूर्वाग्रहों को रखते हुए भी मेक्समूलर ने उसमे निहित शाश्वत ज्ञान की ओर संकेत करते हुए कहा था कि

जब तक इस धरती पर पर्वत श्रेणियाँ रहेगी तथा नदियां प्रवाहित होती रहेगी तब तक ऋग्वेद की महिमा मानवों के मानस पटल पर स्थायी रूप में अंकित रहेगी |

– स्कॉलर एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी (मेक्समूलर की जीवनी) – लेखक – नीरज चौधरी

कौन थे मैक्स मूलर-

प्रोफेसर मेक्समूलर का जन्म 6 दिसंबर 1823 को हुआ , वे जर्मनी के प्रसिद्द संस्कृतवेत्ता थे और प्राच्य विद्या विशारद , लेखक और भाषा शास्त्री थे |

वह ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी में कर्मचारी थे , मेक्समूलर ने वेदों का भाष्य भी किया |

वेदों का भाष्य करने में विशेष विद्वानों में ग्रिफिथ और मेक्समूलर का नाम आता है |

जब भी वेद के भाष्य कि बात आती है तो हमारी अंग्रेजी मानसिकता के भारतीय लोग मेक्समूलर और ग्रिफिथ के वेद भाष्यों को प्रामाणिक मानते हैं |

हालाँकि इनके वेद भाष्य पूर्णतः अन्धकार में है |

मेक्समूलर पर वेदों का जादू

मेक्समूलर द्वारा किये गए वेद भाष्य पूर्णतः अँधेरे में हैं क्यों की मेक्समूलर को संस्कृत भाषा का उतना ज्ञान नहीं था जितना वेद भाष्य करने के लिए आवश्यक होता है |

इतना ही नहीं वेदों का भाष्य करने के लिए व्याकरण शाश्त्र का गंभीर अध्ययन ,उपनिषद ,दर्शन शास्त्रों ,ब्राम्हण ग्रंथों का स्वाध्याय होना परम आवश्यक है |

इन सबके अतिरिक्त एक व्यक्ति का योगी होना सबसे महत्वपूर्ण है |

मेक्समूलर में इन चीजों का होना तो बहुत दूर की बात थी अपितु मेक्समूलर को संस्कृत का सामान्य ज्ञान था |

जो की वेदों का भाष्य करने के लिए पर्याप्त नहीं थी , इसलिए मेक्समूलर ने कहा कि –

वेद तो गड़रियों के गीत है

लेकिन जादू वही जो सर चढ़ कर बोले |

जो मेक्समूलर वेद को गड़रियों के गीत कहते थे , वही वेद के मन्त्रों को ग्रामोफोन में रिकॉर्ड करवाते है , यह वेदों का जादू |

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