ब्रम्हांड क्यों बना ? Why The Universe Was Created ?

why universe created

जब हम इस ब्रम्हांड को देखते हैं इसकी विभिन्न क्रियाओ को देखते हैं यह सवाल हम सब के मन में उठता कि आखिर यह ब्रम्हांड कैसे बना ? इस एक सवाल की खोज में सालों से वैज्ञानिक लगे हुए हैं ,लेकिन इस सवाल के अलावा एक और सवाल है जो इस से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि यह ब्रम्हांड क्यों बना ? क्यों का महत्व कैसे से अधिक है , सबसे बड़ा सवाल ही “क्यों” है आपके घर में कोई व्यक्ति आता है तो आप सबसे पहले पूछते हो – क्यों आये , आप यह नहीं पूछते कि कैसे आये ? क्यों का महत्व कैसे से अधिक है , इसीलिए विज्ञान में यह भी एक सवाल आता है कि why the universe exist ?

“क्यों” को जानना दर्शन का क्षेत्र है और “कैसे” को जानना विज्ञान का क्षेत्र है , ब्रम्हांड कैसे बना यह विज्ञान बताएगा ? लेकिन ब्रम्हांड क्यों बना ये दर्शन बताएगा |

यदि यह माना जाये कि ब्रम्हांड अपने आप बना है तब इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं रह जाता है कि ब्रम्हांड क्यों बना ? क्यों कि अपने आप बनने की Theory में इसे या तो इसे आकस्मिक रूप से बना हुआ माना जाता है या  स्वाभाविक रूप से यानि Naturally , दोनों ही संभावनाओं में कोई प्रयोजन या उद्देश्य नहीं होगा और बिना उद्देश्य के यह प्रश्न निराधार होगा , ब्रम्हांड में हर जगह नियम कार्य कर रहे हैं और ये नियम पूर्णता के साथ संचालित है |
ब्रम्हांड में हर जगह वैज्ञानिकता दिखाई देने के कारण अनेकों वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया कि इस ब्रम्हांड को बनाने वाली एक बुद्धिमान सत्ता जरूर है , वे सब वैज्ञानिक प्रचलित religions के ईश्वर को अवैज्ञानिक मानते हैं लेकिन वे एक बुद्धिमान सत्ता को जरूर स्वीकार करते हैं जिसका एक वैज्ञानिक स्वरूप(Scientific Form) है , वैज्ञानिकों के इन विचारों को जानने के लिए आप निम्न लेख पढ़ सकते हैं |

Scientists Accepted Scientific Form of God

इसलिए यह बात सिद्ध है कि ब्रम्हांड को किसी ने बनाया है और ऐसा होने पर यह प्रश्न बिलकुल उचित बैठता है कि ब्रम्हांड को क्यों बनाया ? इसका अस्तित्व क्यों है ?

दर्शन के क्षेत्र में उतरकर इस सवाल का जवाब हम एक विद्वान् की लेखनी से ही आपको दे रहे हैं , जिसे पढ़कर आप स्वयं उनकी विद्वता का अनुमान लगा लेंगे इसलिए उन विद्वान् का नाम लेना आवश्यक नहीं , लेख के अंत में ही उनका नाम पता चलेगा , तो चलिए शुरू करते हैं –

आज हमारे एक मेहरबान ने कहा कि

दिल में मेरे ये खयाल उत्पन्न होता है जब वह अपने आप में कोई कमी नहीं रखता | पूर्ण है !! Perfect है !!! तो दुनिया क्यों बनाई ?

मैंने कहा कि

यही दलील बनाने कि जरूरत को साबित करती है यानी उसका हर तरह से पूर्ण होना |

आप कहेंगे – कैसे ? जिसके अंदर कोई ख्वाहिश नहीं , कोई इच्छा नहीं ,कोई कमी नहीं , लेकिन पूर्णता है हर प्रकार की , इल्म भी उसका पूरा है , शक्ति भी उसमे पूरी है और व्यापकता भी उसकी पूरी है , तीनों प्रकार से जो पूरा है यानि परमात्मा ! तो बतलाइये वह अपनी पूर्णता को किस प्रकार सफल करे ? अपने इस कमाल को किस प्रकार बाकार करे ?

क्यों कि किसी शय का होना महज होने के लिए हो तो उसका होना न होने के बराबर होता है , जरा गौर कीजिये मेरे शब्दों पर , किसी वस्तु का होना महज होने के लिए हो तो उसका होना न होने के बराबर होता है | परमात्मा पूर्ण है अपनी पूर्णता का क्या लाभ ? अपने पुरे आलिम(काबिल) होने का क्या लाभ ? सूरज से प्रकाश हमको मिलता है , इस बल्ब से भी प्रकाश हमें मिलता है | हम पूछते है कि इसका इसके आलावा और कोई लाभ है कि आपको रोशनी दे रहा है ?

पूर्णता का होना इसी चीज में पूरा होगा कि जितना ज्यादा फायदा उसकी पूर्णता का यानी कमाल से दूसरे को हो जाये उतना ही उसका वजूद सफल है , और जितना न पहुंचे उतना असफल है |

आप कल्पना कीजिये कि – एक वजूद (अस्तित्व) है और उसके अलावा और कोई नहीं है तथा वही तो मैं कहूंगा उसका होना न होने के बराबर है |



उदाहरण के तौर पर अगर एक बड़ा डॉक्टर है , लेकिन बीमार कोई नहीं है और न दुनिया में दवाइयां है तो मुझे बताइये कि डॉक्टर के होने का क्या फायदा है ?

इसलिए विद्वान् लोगों ने कहा है कि जो अपने अंदर कोई गुण रखता है , उस गुण कि सफलता अन्य को लाभ पहुँचाने में है | अपनी आवश्यकता तो हम पूरी करते ही हैं , लेकिन अपने कमाल से गैरों की आवश्यकता को पूरा करना और उनके लिए सहारा बनना , यह ऊँचे दर्जे की बात है |
एक अंग्रेजी का बहुत छोटा सा जुमला है

Every opportunity to help is a duty.

प्रत्येक अवसर जो हमें सहायता का मिल जाये वह हमारा कर्त्तव्य है , जो मौका भी हमें मिल जाए किसी की मदद करने का वह हमारा फर्ज है , क्यों कि हम अपने गुण से कुछ तो फायदा पहुंचाए , अपने कमाल से उनको लाभान्वित करें |

मेरा बोलना तभी सफल है जब सुनने वाले हो , श्रोताओं के बिना मेरा बोलना सफल नहीं है , इसी तरह परमात्मा का वजूद कहाँ सफल होगा ? परमात्मा सर्वज्ञ है |

ज्ञान हमेशा अनपढ़ों में सफल होता है , ताकत हमेशा कमजोरों की रक्षा में सफल होती है , याद रखिये रोशनी हमेशा अँधेरे में सफल होती है , जहाँ अँधेरा है वही उसको ले जाइये रोशनी सफल हो जाएगी , जो ज्ञानी है , पढ़े लिखे है , वे अपनी जिंदगी को वहीँ सफल कर सकते हैं जहाँ अज्ञानी , अनपढ़ है , ताकि उनको कुछ पढ़ा सके , इस से पढ़े लिखे लोग सफल हो जायेंगे |

ईश्वर सर्वज्ञ है , सर्वज्ञ होने से उसकी जिम्मेदारी अपने आप सिद्ध है उसकी responsibility का आगाज स्वयं सिद्ध है , जब ईश्वर जानता है कि जीवात्मा अल्पज्ञ है , ज्ञान में कमजोर है , कम जानने वाला है और मैं (ईश्वर) सर्वज्ञ हूँ , सब कुछ जानने वाला हूँ तो इस से बेहतर और कौन सा मौका होगा ईश्वर के लिए कि वो अपने अस्तित्व को सफल कर सके , अपने ज्ञान को सफल कर सके , बेकार न जाने दे useful बनाये , unuseful न रहने दे |

सोचने की बात है कि इस हिसाब से ईश्वर ने क्या किया ? जीवात्मा हमेशा से उसके साथ है अनादि काल से तो अनादि काल से ईश्वर ने क्या समझा ? कि मेरी Duty है अब मेरा कर्त्तव्य है – Every opportunity to help is a duty और ये मौका ईश्वर को अनादि काल से मिला हुआ है वो अनादि काल – There is no beginning at all जहाँ कोई शुरुआत नहीं है तब से मिला हुआ है ,इसलिए ईश्वर सृष्टि रचना करके , जीवात्मा को ज्ञान प्रदान करता है और अपने अस्तित्व को सफल करता है |

परिवार में पिता के लिए बड़ा पछतावा होता है जब कोई उनको कहे कि आप इतने विद्वान और आपका बेटा जाहिल रह गया , क्या वजह ? इसलिए कहते हैं परमात्मा हमेशा से जानता है कि मेरा अपना ज्ञान जीवात्मा के होने से ही सफल है , यदि जीवात्मा न हो और प्रकृति न हो तो ईश्वर भी नही होगा , बल्कि न होने के बराबर होगा | किसके लिए होगा फिर वह ? अगर प्रकृति नहीं तो अपनी कारीगरी किसमें दिखाए ?



इसलिए ईश्वर के पास जीवात्मा हमेशा से है और प्रकृति भी हमेशा से है , यह देखकर वह खली कैसे बैठा रहे ? खली बैठने के लिए लोग क्या कहा करते हैं ?

An idle mind is devil’s workshop

यानि कि खाली दिमाग शैतान का घर , इसलिए यह सवाल हम मुसलमानों से किया करते हैं , आप यह बताइये कि जब अकेला खुदा ही था और कोई नहीं था तब खुदा किसके लिए था ? वे कहते हैं कि अपनी कुदरत दिखाने के लिए दुनिया पैदा की हम पूछते हैं किसको दिखाने के लिए ? जिसको दिखाना है वह तो पैदा ही नहीं हुआ था , जिसको दिखाना है वह पहले से होना चाहिए , नहीं है तो किसको दिखाता ?
इसलिए यहाँ एक कारण स्पष्ट है कि ईश्वर ने दुनिया को , ब्रम्हांड को जीवात्मा के लिए बनाया , इस कारण की विवेचना को आप ने ऊपर पढ़ा , यह पंडित रामचंद्र देहलवी जी की पुस्तक से लिया गया है , जिस पुस्तक का नाम ही है ” ईश्वर ने दुनिया क्यों बनाई “

आइये हम इस सवाल का एक दूसरा पक्ष देखते हैं , महर्षि दयानन्द अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में इस प्रश्न का जवाब देते है

(प्रश्नजगत् के बनाने में परमेश्वर का क्या प्रयोजन है?

(उत्तरनहीं बनाने में क्या प्रयोजन है?

(प्रश्नजो न बनाता तो आनन्द में बना रहता और जीवों को भी सुख-दुःख प्राप्त न होता।

(उत्तरयह आलसी और दरिद्र लोगों की बातें हैं पुरुषार्थी की नहीं और जीवों को प्रलय में क्या सुख वा दुःख है? जो सृष्टि के सुख दुःख की तुलना की जाय तो सुख कई गुना अधिक होता और बहुत से पवित्रात्मा जीव मुक्ति के साधन कर मोक्ष के आनन्द को भी प्राप्त होते हैं।

प्रलय में निकम्मे जैसे सुषुप्ति में पडे़ रहते हैं वैसे रहते हैं और प्रलय के पूर्व सृष्टि में जीवों के किये पाप पुण्य कर्मों का फल ईश्वर कैसे दे सकता और जीव क्यों कर भोग सकते? जो तुम से कोई पूछे कि आंख के होने में क्या प्रयोजन है? तुम यही कहोगे कि देखना |

तो जो ईश्वर में जगत् की रचना करने का विज्ञान, बल और क्रिया है उस का क्या प्रयोजन ? विना जगत् की उत्पत्ति करने के ? दूसरा कुछ भी न कह सकोगे। और परमात्मा के न्याय, धारण, दया आदि गुण भी तभी सार्थक हो सकते हैं जब जगत् को बनावे। उस का अनन्त सामर्थ्य जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और व्यवस्था करने ही से सफल है। जैसे नेत्र का स्वाभाविक गुण देखना है वैसे परमेश्वर का स्वाभाविक गुण जगत् की उत्पत्ति करके सब जीवों को असंख्य पदार्थ देकर परोपकार करना है।

यहाँ ऋषि ने स्पष्ट कर दिया कि इस सृष्टि के बनाने में ईश्वर का क्या उद्देश्य है , आशा है आपको यहाँ एक नई जानकारी मिली होगी इसलिए लेख को अपने दोस्तों के साथ share जरूर करें |

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