क्या किसी वस्तु को अनंत बार तोडना सम्भव है ?

parmanu




परमाणु के विषय में यदि हम विचार करें तो दो प्रकार की धारणा उत्पन्न होगी , परमाणु वह है जिसका आगे विभाग न हो इस विषय में दो सम्भावना है –

  1.  किसी भी कण का विभाग करते करते एक ऐसी अवस्था आएगी जिसमे आगे विभाग/टूटना न हो ।
  2.  ऐसी कोई अवस्था नही आएगी |

पहले मत को मानने पर प्रश्न एक भी नहीं आ सकता , किन्तु दो सम्भावनाओ में दूसरी सम्भावना पर भी विचार करना आवश्यक है यदि दूसरी सम्भावना निरस्त हो जाये तो यह सिद्ध है की परमाणु नाम की अवस्था माननी ही पड़ेगी किन्तु कुछ लोग जिद से इस पारिभाषिक “परमाणु” को डाल्टन के एटम से जोड़ते है – ध्यान रखिये परमाणु “एटम” नही है ।

अब हम दूसरी सम्भावना पर विचार करेंगे – दूसरी सम्भावना में ऐसी कोई अवस्था नही हो सकती , इस सम्भावना के समाधान में यह कहा जा सकता है की अणु के टुकडे होकर अन्य टुकड़ो के भी टुकड़े होते रहे और इसका कोई अंत न आये इसलिए ऐसी कोई अवस्था नही आएगी ।
इसे हम अनादि कारण अवधारणा कह सकते है किन्तु यह युक्तियुक्त(Logical) नही है – कैसे ? इसका विवेचन हम आगे करते है |

अनादि कारण विवेचना –

अनादि(Beginningless) कारण मानने का अर्थ क्या है इस पर विचार करने पर पता चलता है की जो अनादि है , वह अनंत भी होगा , क्यों की इसमें हमें मानना पड़ेगा कि अनंत या अनादि समय से वस्तुए बनती चली आ रही है , अतः कारण का प्रवाह अनादि होने पर कार्य का प्रवाह अनंत मानना पड़ेगा , जिसका स्पष्ट सामान्य अर्थ होगा की अनादि समय से कारण से कार्य होता आ रहा है ,इसके लिए ऊपर दिए गए चित्र को देखकर समझें | चित्र में जो वस्तु टूट रही है वो कार्य है और जो वस्तु जिस वस्तु या जिन भागों में टूट रही है वे कारण है , जैसे घड़ा टूटने पर मिटटी में मिल जायेगा , घड़ा कार्य है , मिटटी उसका कारण लेकिन अनादि कारण Theory में हर वस्तु कारण और कार्य दोनों बन जाएगी | अब इस पर निम्न प्रश्न आएंगे |



1. उपरोक्त विवेचन और चित्र से स्पष्ट है की इस धारणा अनुसार अनादि समय से ” कारण से कार्य ” होता चला आ रहा है – कारण से कार्य का अर्थ है सृजन और कार्य से कारण का अर्थ है विनाश – अर्थात अनादि समय से सृजन(Creation) चला आ रहा है – और अनंत समय तक सृजन ही चलेगा क्यों की प्रवाह “कारण से कार्य” की ओर है – किन्तु ऐसा हमे ब्रम्हांड में ऐसा देखने में नही आता बल्कि ब्रम्हांड में सृजन के आलावा विनाश भी दिखाई देता है अतः यह धारणा मिथ्या सिद्ध होती है ।

2. कारण से कार्य प्रवाह निरन्तर मानना पड़ेगा जिसका अर्थ हुआ की सृजन रुकना नही चाहिए किन्तु आप रेत को उठाकर देखिये , उसका प्रत्येक कण यदि इस प्रकार अनादि कारण से बना है तो वह कण आगे और क्यों नही बना , प्रत्येक कण आगे क्यों नही बना , प्रत्येक कण तक यह प्रक्रिया रुक क्यों गयी ??
3.चित्र से स्पष्ट है की जो किसी का कारण है वह किसी का कार्य भी है अतः प्रत्येक कण “कारण/कार्य” दोनों से नामांकित किया गया है , अब प्रश्न उठेगा कि यदि पृथ्वी अनादि कारण से बना कार्य है तो पृथ्वी भी “कारण और कार्य दोनो मानी जायेगी – प्रश्न उठेगा पृथ्वी कार्य तो है किन्तु वह कारण किसका है ? इसी प्रकार सूर्य चन्द्र ,ग्रह , उपग्रह, नक्षत्र आदि सब कार्य तो है किन्तु कारण किसके है ?

अनादि कारण मानने पर उपरोक्त प्रश्नों का कोई समाधान नही मिल सकता अतः प्रथम मत ही उचित है की परमाणु नाम की अवस्था को स्वीकार किया जाए ।
परमाणु के पक्ष में एक तर्क यह भी आएगा कि ” क्योंकि सृजन का अंत है अतः शुरुआत भी होनी चाहिए ” जो की सिद्ध करती की “मूल का कोई मूल नही होता” , इसलिए एक अंतिम अवस्था माननी पड़ेगी जो सबका मूल होगी , जिस से सब बने है और जो कभी बनी नहीं |


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